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प्रेम - एक अनोखी कला


File:Pune OSHO Teerth Park Preeti-Parashar 11.JPG - Wikimedia Commons

प्रेम - एक अनोखी कला

एक एयर होस्टेस, एक परिचारिका मुझे कह रही थी। एक बूढी महिला हवाई जहाज पर चढ़ी, पहली दफा! और उस परिचारिका ने देखा कि वह बहुत घबड़ा रही है, नर्वस है, काँप रही है। पहली दफा अनुभव था। बूढी महिला! तो वह परिचारिका उसके पास गई, उसकी कुर्सी पर बैठ गई, उसके सिर को अपने हृदय से लगा लिया। तब तक जहाज ऊपर उठ गया, सब व्यवस्थित हो गया। धक्के आने बंद हो गए। इंजन संगीतपूर्ण रूप से चलने लगे। सब थिर हो गया। तो वह परिचारिका उठी। और जब वह जाने लगी तो बूढी ने कहा, “बेटी! जब मुझे फिर डर लगे तो आ जाना!
जब तुम किसी को प्रेम देते हो, तब अनायास दूसरी तरफ से भी प्रेम बहने लगता है। सुलगाओ, कहीं से भी सुलगाओ चिंगारी। लपटें फिर दूसरों में फैलती चली जाती हैं! तुमने कभी किसी मकान में आग लगी देखी! एक मकान में आग लगती है, सारा पड़ोस घबड़ा जाता है, क्योंकि लपटों का क्या भरोसा, फैलने लगती हैं। हवा पर सवार होकर छलांग लेती है लपट और दूसरे मकान को पकड़ लेती है।
प्रेम भी आग है। तुम जरा जलाओ! तुम जरा चिंगारी उठाओ! और सब तरफ से तुम्हारी लपट को बढ़ाने के उपाय होने लगेंगे। तुम जो करते हो, संसार उसी में तुम्हारा साथी हो जाता है। अब अगर तुम्हीं थके-मांदे बैठे हो कि कैसे चलना हेगा, कैसे प्रेम करना होगाहै ही नहीं! कौन लेकर आया है? जन्म के साथ कोई प्रेम की तिजोड़ी साथ लेकर आता है? संभावना लेकर आता है। संभावना सभी की है और आखिरी श्वास तक है।

प्रेम बिलकुल अनूठी बात है,
उसका बुद्धि से कोई सम्बन्ध नहीं।
प्रेम का विचार से कोई संबंध नहीं।
जैसा ध्यान निर्विचार है,
वैसा ही प्रेम निर्विचार है।
और जैसे ध्यान बुद्धि से नहींसम्हाला जा सकता,
वैसे ही प्रेम भी बुद्धि से नहीं सम्हाला जा सकता।
ध्यान और प्रेम करीब-करीब एक ही अनुभव के दो नाम हैं।
जब किसी दूसरे व्यक्ति के संपर्क में ध्यान घटताशहै,
तो हम उसे प्रेम कहते हैं।
और जब बिना किसी दूसरे व्यक्ति के,
अकेले ही प्रेम घट जाता है,
तो उसे हम ध्यान कहते हैं।
ध्यान और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
ध्यान और प्रेम एक ही दरवाजे का नाम है,
दो अलग-अलग स्थानों से देखा गया।
अगर बाहर से देखोगे, तो दरवाजा प्रेम है।
अगर भीतर से देखोगे, तो दरवाजा ध्यान है।
जैसे एक ही दरवाजे पर बाहर से लिखा होता है
एंट्रेन्स, प्रवेश; और भीतर से लिखा होता है
एग्जिट, बहिर्गमन।
वह दरवाजा दोनों काम करता है। अगर
बाहर से उस दरवाजे पर आप पहुँचे, तो लिखा है प्रेम। अगर
भीतर से उस दरवाजे को अनुभव किया तो लिखा ध्यान।
ध्यान अकेले में ही प्रेम से भर जाने का नाम है
और प्रेम दूसरों के साथ ध्यान में उतर जाने की कला है।

ओशो.

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