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काम_रहस्य : काम कला : ओशो की नजर से


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काम_रहस्य : काम कला : ओशो की नजर से

 मनुष्य को यह अनुभव में आ गया बहुत पहले कि सेक्स का अनुभव शक्ति को क्षीण करता है, जीवन ऊर्जा कम होती है और धीरे- धीरे मौत करीब आती है । पछताता है आदमी, लेकिन इतना पछताने के बाद फिर पाता है कि कुछ घड़ियों के बाद वही आतुरता है । निश्चित ही इस आतुरता में कुछ और अर्थ है, जो समझ लेना जरूरी है ।
सेक्स की आतुरता में कोई 'रिलीजस' अनुभव है, कोई आत्मिक अनुभव है । उस अनुभव को अगर हम देख पाएं तो हम सेक्स के उपर उठ सकते हैं । अगर उस अनुभव को हम न देख पाएं तो हम सेक्स में ही जिएंगे और मर जाएंगे । 


* 'संभोग से समाधि की ओर' में ओशो कहते हैं कि सेक्स का विरोध नहीं है ब्रह्मचर्य, बल्कि सेक्स का ट्रांसफॉर्मेशन है। जो सेक्स का दुश्मन है, वह कभी ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं हो सकता।

* जिस दिन इस देश में सेक्स की सहज स्वीकृति हो जाएगी, उस दिन इतनी बड़ी ऊर्जा मुक्त होगी भारत में कि हम आइंस्टीन पैदा कर सकते हैं।

* पति अपनी पत्नी के पास ऐसे जाए, जैसे कोई मंदिर के पास जाता है। पत्नी अपने पति के पास ऐसे जाए, जैसे कोई परमात्मा के पास जाता है, क्योंकि जब दो प्रेमी संभोग करते हैं, तो वास्तव में वे परमात्मा के मंदिर से ही गुजरते हैं।

* संभोग का इतना आकर्षण क्षणिक समाधि के लिए है। संभोग से आप उस दिन मुक्त होंगे जिस दिन आपको समाधि बिना संभोग के हासिल होनी शुरू हो जाएगी।

*परिवार नियोजन की बात धीरे-धीरे अनिवार्य हो जानी चाहिए। इसे किसी की स्वेच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता।


मनुष्य को यह अनुभव में आ गया बहुत पहले कि सेक्स का अनुभव शक्ति को क्षीण करता है, जीवन ऊर्जा कम होती है और धीरे- धीरे मौत करीब आती है । पछताता है आदमी, लेकिन इतना पछताने के बाद फिर पाता है कि कुछ घड़ियों के बाद वही आतुरता है । निश्चित ही इस आतुरता में कुछ और अर्थ है, जो समझ लेना जरूरी है ।
  सेक्स की आतुरता में कोई 'रिलीजस' अनुभव है, कोई आत्मिक अनुभव है । उस अनुभव को अगर हम देख पाएं तो हम सेक्स के उपर उठ सकते हैं । अगर उस अनुभव को हम न देख पाएं तो हम सेक्स में ही जिएंगे और मर जाएंगे ।
 

आदमी सेक्स को दबाने के कारण ही बंध गया और जकड़ गया । और यही वजह है कि पशुओं की तो सेक्स की कोई अवधि होती है, कोई पीरियड होता है । वर्ष में ; आदमी की कोई अवधि न रही, कोई पीरियड न रहा? आदमी चौबीस घंटे, बारह महिने सेक्सुअल है! सारे जानवरों में कोई जानवर ऐसा नहीं है कि जो बारह महिने चौबीस घंटे कामुकता से भरा हुआ हो। उसका वक्त है, उसकी ऋतु है ; वह आती है और चली जाती है । और फिर उसका स्मरण भी खो जाता है । आदमी को क्या हो गया है?

आदमी ने दबाया जिस चीज को, वह फैल कर उसके चौबीस घंटे और बारह महिने के जीवन पर फैल गई है ।

सेक्स को दबाओ --- और चौबीस घंटे सेक्स का जूता सिर पर घूमने लगेगा । क्रोध को दबाओ___ और चौबीस घंटे क्रोध प्राणों में घुसकर चक्कर काटने लगेगा । और एक तरफ से दबाओ, तो दूसरी तरफ से निकलने की चेष्टा शुरू हो जाएगी, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में ऊर्जा है, एनर्जी है । आप दबाओगे एनर्जी को तो वह कहीं से निकलेगी? एक झरने को आप इधर रोक दो, तो दूसरी तरफ से फूट कर बहने लगेगा । उधर से दबाओ, तो तीसरी तरफ से बहने लगेगा ।
संभोग से समाधि की ओर #ओशो

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