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स्त्रीत्व को छूना भी एक कला है - संभोग एक कला

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स्त्रीत्व को छूना भी एक कला है।


तुम नंगे हो जाओ, कपडे उतारने की बात नहीं कह रहा हूँ; मन के आवरणों को हटाने की बात कह रहा हूँ। लेकिन जब भी ऐसी कोई बात होती है तो तुम्हारे ख्यालो में स्त्री ही आती है! क्योकि ये बात जानकर तुम हैरान होगे कि तुम्हारी पत्नी भी स्त्री ही है!

तुम रोज उसे बिस्तर पर साथ पाते हो पर फिर भी उसे समझने की, जानने की चाह कभी नही की! अभी तुम्हे स्त्रीत्व तक पहुँचने में देर है; स्त्री को समझने का, उसके तन को जानने का दम चाहिए। अदभुत साहस चाहिए, प्रेम की अनुभूति चाहिए। परम की आकांक्षा चाहिए।

जबकि लोग उसके उभारो की ऊँचाई देखकर गिर जाते हैं। उसकी गहराइयो में ऐसे डूबते हैं कि मरकर के वापस आते हैं। इसलिए जब भी तुम्हें स्त्री के नजदीक जाने का अवसर मिले तो चूकना मत! जरुरी नहीं कि हर बार तुम सेक्स में हो जाओ, कुछ समय ऐसा भी गुजारना; जहाँ तुम शरीर के पार देखने की कोशिश करना; शायद तुम उसके दिल की धडकन सुन सको, शायद तुम उसके स्त्रीत्व को छू सको, और जिस पल तुमने उसके स्त्रीत्व को छू लिया!

तब अचानक से वासना तिरोहित होगी, और प्रेम का आगमन होगा, तुम एक परमसुख की अनुभूति करोगे, एक ऐसा आनंद जो तुम्हे जन्मों जन्मों तक गुदगुदाता रहेगा, तुम मुस्करा उठोगे, खिल जाओगे, और यही खिलावट तुम्हे जीवन के परम सत्ता की अनुभूति देगी, जीवन के परमआनंद से तुम्हारा मिलन होगा।

ओशो

प्रेम पूर्ण ढंग है--और ज्यादा आंतरिक है ।

स्त्री काया नही ... ह्रदय हैं
जो छू सको तो स्त्रीत्व छूना
जब स्त्री किसी को गले लगेगी, तो आंख बंद कर लेगी। इसलिए स्त्रियों को पुरुषों के रंग में, रूप में, आकृति में उतनी उत्सुकता नहीं होती, जितनी उनकी संस्कारशीलता में उत्सुकता होती है। स्त्रियां अलग चीजों से प्रभावित होती हैं--पुरुष अलग चीजों से। पुरुष देखता है कि रंग कैसा है, रूप कैसा है, नक्श कैसा है। नख से शिख तक वह पूरा का पूरा रूप-रंग-आवरण--सब देखता है। बाल का रंग, चमड़ी का रंग, नाक का ढंग, आंख का ढंग! स्त्री इन चीजों में उतना रस नहीं लेती। उसका रस कुछ और है। वह देखती है: पुरुष में कितना प्रसाद है; कितना विनम्र, कितना सरल है। कितना आनंदित व्यक्ति है, आह्लादित व्यक्ति है! अब आह्लाद का, आनंद का, प्रसाद का नाक की लंबाई से कोई संबंध नहीं है। न रंग से कोई संबंध है।

और स्त्री को जब तुम आलिंगन करोगे, तो वह आंख बंद कर लेगी, क्योंकि वह तुम्हें भीतर से पकड़ना चाहती है। वह तुम्हारे भीतर डूब जाना चाहती है। वह अंतर्मुखी है। पुरुष बहिर्मुखी है। वह स्त्री को प्रेम भी करना चाहता है, तो बिजली का बल्ब जला कर करना चाहता है। वह देखना चाहता है कि उसके चेहरे पर क्या भाव आते हैं। यहां तक ही नहीं--यहां तक पागल पुरुष हैं कि आईने लगा रखते हैं अपने बिस्तर के ऊपर, कि अगर ठीक से न देख पाएं, तो आईने में दिखाई पड़ता रहे!
जीवन भीतर ऊंचाइयां छूने लगे। तुम्हारे भीतर शिखर उठने लगें चैतन्य के। वह आत्मा को आविष्कृत करने का विज्ञान है।
पुरुष को रस है उनमें। स्त्रियों को इस बात में बहुत रस नहीं है। बहुत उत्सुकता नहीं है कि वे पुरुषों कि नग्न चित्र देखें। उसे पुरुष की आत्मा में रस है, देह में कम।


Osho.

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