सत्य क्या हे : बुद्ध की जुबानी
बुद्ध जब पहली दफा सत्य को उपलब्ध हुए, तब उनके पास कोई भी नहीं था। वे अकेले थे। वे यात्रा करते थे। अनजान, भिखमंगे फकीर थे। तब उन्हें कोई भी नहीं जानता था। वे काशी के बाहर आकर एक वृक्ष के नीचे विश्राम किए। संध्या को जब सूरज ढलता था, तब वे एक झाड़ के नीचे फटे कपड़ों में लेटे हुए थे। काशी का जो नरेश था, वह कुछ दिनों से बहुत दुखी, बहुत चिंतित, बहुत पीड़ित था। उसने अनेक बार आत्मघात करने का भी उपाय किया, लेकिन असफल रहा। वह उस सांझ को अपना मन बहलाने को रथ को लेकर गांव के बाहर निकला। सूरज ढलता था, उसकी अंतिम किरणें बुद्ध की मुखमुद्रा को प्रकाशित करती थीं। वे एक वृक्ष के नीचे टिके आंख बंद किए लेटे थे। सारथी रथ को हांके जाता था। अचानक उस राजा की दृष्टि इस भिखमंगे पर पड़ी। उसने सारथी को कहा, रथ रोक लो! यह कौन व्यक्ति यहां लेटा हुआ है? जिसके पास कुछ भी मालूम नहीं होता, उसके पास सब कुछ कैसे दिखाई पड़ रहा है? उस राजा ने कहा, जिस भिखमंगे के पास कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, उसके पास सब कुछ कैसे दिखाई पड़ता है? रथ रोको! मेरे पास सब कुछ है और मुझे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता!!!
वे उतर कर गए। और उन्होंने बुद्ध को कहा कि क्या मैं यह पूछूं कि यह अदभुत समृद्ध-भिखमंगा कौन है? जो शब्द हैं, वे यह कि यह अदभुत समृद्ध-भिखमंगा कौन है?
बुद्ध ने कहा, एक दिन मैं भी दरिद्र-समृद्ध था। जो तुम हो, एक दिन मैं भी वही था। बहुत मेरे पास था और मेरे भीतर कुछ भी नहीं था।
उस राजा ने कहा, मैं बहुत पीड़ित हूं। क्या यह कभी मुझे भी संभव हो सकता है जो तुम्हें संभव हुआ?
बुद्ध ने कहा, जो एक बीज के लिए संभव है, वह हर दूसरे बीज के लिए संभव है। हर बीज वृक्ष बन सकता है। जो मुझे फलित हुआ, वह तुम्हें फलित हो सकता है। क्योंकि मनुष्य की आंतरिक एकता समान है। और मनुष्य की आंतरिक संभावना समान है। लेकिन कुछ करना होगा।
उस राजा ने बुद्ध को कहा, मैं कुछ भी करने को तैयार हूं और मैं कुछ भी खोने को तैयार हूं, क्योंकि सच तो यह है कि जो भी मेरे पास है, उसका अब मुझे कोई मूल्य मालूम नहीं होता।
बुद्ध ने कहा, और कुछ खोने से वह नहीं मिलता है; जो स्वयं को खोने को तैयार होता है, उसे ही वह मिलता है।
उस स्वयं को खोने को मैंने मृत्यु कहा। जो स्वयं को खोने को राजी हो जाता है, वह स्वयं की परम सत्ता को उपलब्ध हो जाता है। यही सूत्र है। जो बीज मिट्टी में अपने को गलाने के लिए राजी नहीं होता, वह बीज कभी अंकुर नहीं बनता। वह बीज सड़ जाएगा। जिसने कोशिश की कि अपने को बचा लूं, वह बीज सड़ जाएगा, उसमें अंकुर पैदा नहीं होगा। और जो बीज अपने को तोड़ देता और मिटा देता और मिट्टी में गल जाता है कि उसका कोई पता भी नहीं चलता कि कहां गया, वह बीज अंकुर हो जाता है।
अंकुरित होने का सूत्र है: गल जाना और मिट जाना। और जो जीवन में इस भांति मरने लगे, गलने लगे और मिटने लगे और जो अपने को खो दे, वह एक दिन पाएगा कि उसने स्वयं को पा लिया और विराटतर रूपों में। बूंद बूंद की तरह खो जाती है और सागर बन जाती है। व्यक्ति जब व्यक्ति की तरह अपने को खो देता है तो वह परमात्मा हो जाता है।
अमृत की दशा👣ओशो

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