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प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया : osho rajneesh

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प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया-(प्रवचन-04)

 ओशो...

मैं एक बूढ़े आदमी को देखने गया था। वे मर रहे थे। उनकी उम्र कोई अठहत्तर वर्ष थी। कमरे में कोई भी न था, सिर्फ उनकी पत्नी थी। उन्होंने पत्नी से कहा कि तू बाहर जा मुझे कुछ निजी बात करनी है।
उनकी पत्नी बाहर चली गई, मैं भी थोड़ा हैरान हुआ कि निजी बात शायद वे कुछ ध्यान, समाधि। उन्होंने मुझसे कहा कि सिर्फ एक बात पूछनी है कि मैं मरने के करीब आ गया, मौत करीब है, मगर स्त्री के स्तनों में मेरा रस नहीं जाता है! मर रहा हूं, लेकिन वह जो मेरी महिला डाक्टर है, वह देखने आती है तो मौत की भूल जाता हूं, उसके स्तन देखने लगता हूं। 

तो मैं तुमसे यह पूछता हूं कि मेरे अठहत्तर वर्ष की उम्र, सब जिंदगी देख ली, मगर यह स्तन से मेरा रस क्यों नहीं जाता? इसका कारण क्या होगा? और मैं किसी से पूछ भी नहीं सकता। ऐसे तो मुनि महाराज भी आते हैं, मगर उनसे मैं पूछूं तो वे बहुत नाराज हो जाएंगे। आपसे ही पूछ सकता हूं।

मैंने कहाः यह बात सीधी-सादी है। सच तो यह है कि जैसे जन्म के समय पहली याद स्तन की आती है वैसे अकसर मरते वक्त भी आखिरी याद स्तन की आती है। जिन्होंने इस पर खोजबीन की है पूरब के देशों में, उनका कहना है कि मरते वक्त आदमी आखिरी क्षण में स्तन की याद करते ही मरता है। वही उसकी नए गर्भ में प्रवेश की यात्रा है। वर्तुल पूरा हो गया।

जैसे ही बच्चा पैदा होता है वैसे ही उसे दूसरे की जरूरत मालूम होने लगती है। मां के बिना भूखा हो जाता है। मां की जरूरत, मां के स्तन की जरूरत। इसलिए लोगों के मन में मां के स्तन की प्रतीक्षा जीवन-भर बनी रहती है।
चित्रकार स्तन बनाते हैं, मूर्तिकार स्तन बनाते हैं; खजुराहो हो कि कोणार्क हो, बस स्तन ही स्तन। और ऐसे स्तन जो कि होते भी नहीं! इतने बड़े-बड़े स्तन कि स्त्रियां चल भी न सकें, चलें तो गिर जाएं! कविताएं स्तन की। हर चीज स्तन के आस-पास घूमती है। कुछ कारण होना चाहिए, गहरा कारण होना चाहिए।

कारण यही है कि बच्चे का पहला अनुभव इस जगत् का स्तन का अनुभव है। और पहला अनुभव महत्त्वपूर्ण अनुभव है। और इस पहले अनुभव की छाप जिंदगी-भर पीछे रहती है।

लेकिन बच्चे को स्तन की जरूरत है, बहुत जरूरत है। भोजन भी वही, उष्णता भी वही, प्रेम भी वही। दूसरा मुझे आदर करता है, प्रेम करता है, फिकिर करता है–इसका प्रमाण भी वही। बस धीरे-धीरे शुरू हुआ, दूसरा महत्त्वपूर्ण होने लगा। 

मां थोड़ी देर को नहीं आती, बच्चा पानी में पड़ गया है या पेशाब कर ली है और गीला कपड़ा हो गया है, तो परेशान हो रहा है; दूसरे की जरूरत है। असहाय बच्चा दूसरे की जरूरत अनुभव करने लगता है।

और मां-बाप भी इसमें मजा लेते हैं कि बच्चा निर्भर हो। कोई जब आप पर निर्भर होता है तो अच्छा लगता है कि आपकी भी दुनिया में कुछ जरूरत है। जब बच्चे अपने पैर पर खड़े हो जाते हैं तो मां-बाप को सच में अच्छा नहीं लगता। ऊपर से तो कहते हैं कि हम बड़े प्रसन्न हैं कि अब तुम अपने पैर पर खड़े हो गए; मगर उनका चेहरा ज़रा गौर से देखो। 

वे यह कह रहे हैं कि ठीक है; मतलब अब हमारी तुम्हें कोई जरूरत न रही! ऐसे तो ऊपर से बच्चों को शादी-विवाह कर देते हैं, मगर भीतर से विरोध पैदा हो जाता है। इसलिए सास-बहू झगड़ते ही रहते हैं, झगड़ते ही रहते हैं। सास यह बरदाश्त कर ही नहीं सकती कि मेरा बेटा जो सदा मुझ पर निर्भर था आज किसी और स्त्री पर निर्भर हो गया; जिसको बुद्धिमान बनाने में मुझे पच्चीस साल लगे, एक औरत ने पांच मिनिट में बुद्धू बना दिया!
इसको सास बरदाश्त करे भी तो कैसे करे! आग जलती है! यह बिल्कुल स्वाभाविक है। कहते हैं कि प्रसन्न रहो, अब अपने पैर पर खड़े हो गए। मगर ज़रा गौर करना उनके चेहरे पर, उनकी भाषा पर, बड़ी मजबूरी में जैसे बात कही जा रही है! चाहेंगे तो अब भी मां-बाप कि बच्चे उन पर निर्भर रहें। चाहेंगे तो वे सदा निर्भर रहें, क्योंकि उनकी निर्भरता में अहंकार की तृप्ति है।

तो मां-बाप पूरी चेष्टा करते हैं कि बच्चा निर्भर हो, हर चीज पर निर्भर हो। बच्चे ही निर्भर नहीं कर लेते हम, हम बड़ों को भी निर्भर करते हैं। स्त्रियां पतियों को बिल्कुल निर्भर कर लेती हैं। ऐसे ऊपर से तो खयाल यही होता है और दिखावा भी यही होता है और शायद पत्नियों को भरोसा भी यही होता है कि हम सेवा कर रहे हैं।
वे पति को माचिस भी न उठाने देंगी, पति को सिगरेट भी न उठाने देंगी; वे खुद उठाकर सिगरेट लाएंगी, माचिस जला देंगी। वे इतना निर्भर कर लेंगी पति को कि दो दिन के लिए पत्नी मायके चली जाए तो पति बिल्कुल असहाय है। उसको पता नहीं है कि सिगरेट कहां है कि माचिस कहां है।

मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन खोज रहा है चौके में। पत्नी चिल्ला रही है कि बड़ी देर हो गई, तुम्हें नमक भी नहीं मिल रहा! उसने कहाः मैंने करीब-करीब सब डब्बे खोल डाले हैं, नमक का कुछ पता नहीं चल रहा। पत्नी ने कहाः तुम अंधे हो बिल्कुल, आंख के अंधे हो! उम्र तुम्हारी हो गई है मगर मेरे बिना तुम एक इंच नहीं चल सकते हो। अरे सामने ही, जिस डब्बे पर लिखा है मिर्ची, उसी में नमक है।

स्त्रियों के अब अपने ढंग होते हैं कि लिखा है मिर्ची और रखा है नमक। यह उनका सीक्रेट-कोड है। ये पति लाख सिर मारकर मर जाएं, कितने ही शब्दकोशों में देखें, मिर्ची कहीं भी नमक नहीं है।

पति को बिल्कुल निर्भर कर देना जरूरी है। पति भी पत्नी को निर्भर कर लेता है अपने ढंग से–गहने लाकर, नई साड़ियां लाकर। यह एक-दूसरे की निर्भरता पर जी रहा जगत् है। यहां हम एक-दूसरे को निर्भर करते हैं, क्योंकि अच्छा लगता है कि हम पर इतने लोग निर्भर हैं। 

जितने ज्यादा लोग तुम पर निर्भर हैं तुम उतने बड़े मालूम पड़ते हो। मगर ध्यान रखना, जब तुम दूसरों को निर्भर करोगे तो दूसरे तुम्हें निर्भर करेंगे। यहां गुलामी पारस्परिक होती है। 

स्वतंत्र होना हो तो किसी को निर्भर मत करना और किसी के निर्भर मत होना। मगर यह जिंदगी का ढांचा ऐसा है कि यहां सब एक-दूसरे के निर्भर हैं और सब चाहते हैं कि एक-दूसरे के निर्भर रहें।

इसलिए धर्म भारती, तुझे अड़चन होती है . . .”अकेलापन इतना महसूस होता है कि घबड़ा जाती हूं।’ घबड़ाने का कोई कारण नहीं है। और मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि जंगल जाकर अकेले हो जाओ। मैं तो यह कह रहा हूं कि संसार में ही रहो, मगर अकेले होने से घबड़ाओ मत, अकेले होने का मजा लो। 

और जब कभी मौका मिल जाए और पतिदेव मछली मारने चले जाएं तो बहुत अच्छा हुआ कि गए। कि पत्नी जाकर पड़ोस में गपशप करने लगे तो बहुत अच्छा हुआ, थोड़ी देर तो अकेले बैठो। थोड़ी देर तो बिल्कुल चुप हो जाओ। बिल्कुल अकेले रह जाओ, जैसे दुनिया में कोई भी नहीं है, तुम्हीं हो बस! तुम्हारा ही अकेला होना है!
और तुम चकित हो जाओगेः उसी चुप बैठने में धीरे-धीरे तुम्हें रस का अनुभव होगा–आत्मरस का! स्वयं की अनुभूति होगी, जो बड़ी प्रीतिकर है, बड़ी सुखदायी है, बड़ी मुक्तिदायी है!

फिर तुम्हें उदासी नहीं घेरेगी। फिर अकेलेपन में तुम्हारे भीतर ऐसी प्रफुल्लता होगी, जैसी संग-साथ में भी न होगी। फिर तुम भीड़ में जाओगे तो ऐसा लगेगा कि कब छुटकारा हो। क्योंकि भीड़ है क्या, सिवाय उपद्रव के? शोरगुल के अतिरिक्त और है क्या तुम्हारी भीड़? 

तुम्हारी पार्टियां और तुम्हारे भोज और तुम्हारे विवाह और तुम्हारे सभा-मंडप सिवाय उपद्रव और शोरगुल के और क्या हैं? उत्सव कहां है? अजीब हालत हो जाती है!

प्रेम-रस-रंग ओढ़ चदरिया-(प्रवचन-04)

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